वे 45 फिल्में जिनमें माता पिता बने मार्गदर्शक/बेशकीमती सलाह ने बदल दी बच्चों की ज़िन्दगी

वे 45 फ़िल्में, जिन्होंने रिश्तों के मायने समझाए/माता पिता की सलाह ने बदली बच्चों की ज़िन्दगी

कहते हैं, बच्चा, माँ बाप की ऊँगली पकड़ कर चलना सीखता है,उन्हें देख कर जीवन में आगे बढ़ता है और फिर एक दिन मंज़िल पाने के लिए सही पटरी पर दौड़ने भी लगता है। डगर चाहे जो हो, कितना भी संघर्ष हो, भले ही बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ सामने आये, माता पिता का अनुभव, उनका ज्ञान और सलाह बच्चों को हर एक चुनौती से लड़ना सिखाती है और एक दिन वह बच्चा चैम्पियन बन जाता है। निजी ज़िन्दगी हो या फिर रुपहला पर्दा, माता पिता के द्वारा लिया गया एक निर्णय बच्चों के भविष्य को एक नयी दिशा में मोड़ देता है। आइये आज हम सिने जगत की उन फिल्मों के बारे में आपको बताते हैं, जिनमें माता पिता ने गुरु बनकर अपने बच्चों का मार्गदर्शन किया और उन्हें उनकी मज़िल तक पहुंचा दिया।

निल बटे सन्नाटा (2015)

ये एक सीधी सादी महिला चंदा और उसकी बेटी की भावनात्मक कहानी है, चंदा गृहणी है और लोगों के घरों में चौका चूल्हा करके बेटी की परवरिश करती है। एक दिन चंदा अपनी बेटी से पूछती है कि वह बड़ी होकर क्या बनना चाहती है? बेटी कहती है कि वह अपनी माँ की तरह गृहणी बनेगी। इतना सुनकर चंदा नाराज़ होती है और बेटी को लक्ष्य दिखाते हुए कहती है, चाहे कुछ भी हो जाए वह गृहणी नहीं बनेगी।

निल बटे सन्नाटा (2015)

यही वह पल था जब चन्दा ने अपनी बेटी की क्षमता को महसूस किया और उसकी बेटी ने भी अपने इरादों की उड़ान भरना शुरू कर दिया। आखिर में यूपीएससी पास करके साक्षात्कार के दौरान बेटी ने अपनी माँ चन्दा को अपनी प्रेरणा बताया।

दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995)

हिंदी फिल्म जगत के सबसे मशहूर डायलॉग “जा सिमरन, जी ले अपनी ज़िन्दगी”, शायद ही कोई इससे अनजान होगा। आदर्शवादी, कुशल, अनुशाषित और कठोर दिखने वाले सफल पिता ने सिमरन को राज के हवाले यूँ ही नहीं कर दिया। ये वाक्या दर्शकों को हैरत करने वाला ज़रूर था लेकिन इसके पीछे राज के पिता अनुपम खेर की सलाह एक अहम् कड़ी थी।

दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995)

हर सम्भव कोशिशों के बाद भी जब राज सिमरन को हासिल नहीं कर सका और मायूस हो गया, तब राज के पिता ने उससे कहा “हम उनमें से हैं जो चाँद को देखते नहीं, चाँद को उठा कर घर ले आते है, अब जा और इस घर में तभी आना जब बहु तेरे साथ होगी। समझा” राज के लिए ये शब्द उत्साहित करने वाले थे और फिर आखिरकार वह अपनी दुल्हनियां को घर ले आता है।

कुछ कुछ होता है (1998)

प्यार और समझौते पर आधारित रिश्तों में कितना फर्क होता है , ये बात अंजलि और उसकी माँ के बीच हुई बातचीत से समझ आ जाता है। सुनने देखने में भले ही ये साधारण सवाल था लेकिन इसके जवाब के बाद अंजलि की ज़िन्दगी ने एक नया मोड़ लिया। सगाई होने के बाद अंजलि की माँ उससे पूछती है ल-कि क्या वह खुश है ?

कुछ कुछ होता है (1998)

इसपर अंजलि माँ को जवाब देते हुए कहती है कि उसका मंगेतर अमन कितना अच्छा लड़का है। इतना सुनहे ही माँ को अंदाज़ा हो जाता है कि ये सगाई एक समझौता है, इसमें प्यार नहीं है। वो बेटी से कहती है कि प्यार के रिश्ते समझौतों पर नहीं टिका करते। माँ की सलाह कामयाब बार फिर अंजलि अपने प्यार को पा लेती है।

बरेली की बर्फी (2017)

बिट्टू माँ बाप की एकलौती बेटी, जो बिंदास, बेफिक्र, खुले विचारों वाली लड़की है। शादी के लिए बिट्टू को सही लड़का नहीं मिल पाता और इसके लिए माँ बिट्टू के व्यवहार और रवैये को दोषी मानती है। माँ के कठोर और तीखे बोल सुनकर बिट्टू की आँख भर आती है और वह घर की छत पर चली जाती है।

बरेली की बर्फी (2017)

बेटी सहारा देने के लिए पिता उसके पास आते हैं, इस पर बिट्टू पिता से सवाल पूछती है कि अगर वह एक लड़का होती तोह क्या जीवन आसान रहता? सवाल गंभीर था, पिता ने एक सच्चे गुरु की तरह यहाँ बेटी को समाज का असली आइना दिखाते हुए ऐसे बातें बतायी जिन्हे सुनने के बाद बिट्टू सम्भली और चिंतामुक्त हो गयी। पिता ने बताया कि समाज ख़ास तरह से सोचता है लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि हम उसकी सब बातों पर विश्वास करें।

इंग्लिश विंग्लिश (2012)

एक मौक़ा आता है जब शशि अपनी भतीजी को अंग्रेजी में शादी के बारे में सलाह देती है, ये दृश्य सबको चौंका देता हैं। शशि शादी को दो बराबर के लोगों का मिलन बताकर इसमें एक अलग और ख़ास दोस्ती होने की बात कहती है जो कि काफी हद तक सच बात है।

इंग्लिश विंग्लिश (2012)

शशि अपने अनुभव का हवाला देते हुए उसे समझाती है कि ज़िन्दगी के लम्बे सफर में किस तरह से उन दोनों को मिलकर एक दूसरे की मदद करनी चाहिए और हमेशा एक दूसरे के लिए पर्याप्त समय निकालना चाहिए। ये बेहतर रिश्ते की कड़ी है।

बाहुबली 2 – द कन्क्लूज़न

चुनौतियों भरे रास्तों पर पूर्ण वेग के साथ आगे बढ़ने की हिम्मत और हौसला,, महेंद्र बाहुबली को कहीं से मिला, तो वह थी दत्तक माता रानी शिवगामी। माता शिवगामी ने हर वक़्त शिक्षा दी और सिखाया की धर्म और न्याय के लिए, सिद्धांतों की रक्षा के लिए अगर आपको भगवान् के विरुद्ध जान पड़े तोह कोई संकोच नहीं करना।

बाहुबली 2 – द कन्क्लूज़न

ये उसका कर्तव्य है, एक योद्धा का कर्तव्य होता है कि वो इन शब्दों का अंतिम सांस तक पालन करे। यही वजह है कि ऐसे सम्मानित आरजा को सदियों तक सम्मान और प्रेम मिलता है।

दंगल (2016)

फोगाट बहनों की कहानी में पिता से बड़ा कोई गुरु नहीं रहा है। बेटियों को किसी भी तरह की सहूलियत नहीं देने में विश्ववास रखने वाला पिता, आशावान और कभी न हार मानने वाले जज़्बे के साथ बेटियों को उनकी मंज़िल तक पहुंचाता है। पिता का मानना है कि उसकी बेटियां किसी से कम नहीं है और वह कुछ भी कर सकती है।

दंगल (2016)

पिता दुनिया में एक अलग पहचान बनाने की एहमियत को बताते हुए अपनी बड़ी बेटी को समझाते हुए कहते हैं “अगर सिल्वर जीती तो आज नहीं तो कल लोग तन्ने भूल जावगें और गोल्ड जीती तो मिसाल बन जावेगी। और मिसाल दी जाती है बेटा भूली ना जाती ” इस सलाह से बेटी में एक नए जज़्बे का संचार हुआ और उसने इतिहास में अपना नाम दर्ज़ कराया।

मर्द को दर्द नहीं होता

फ्लैशबैक में हीरो के बचपन का वाक्या दिखाया जाता है जहाँ कुछ लड़के उसे पीट देते हैं, बच्चा असहाय और लाचार दिखाई पड़ता है। वह आकर अपने दादा से कहता है कि उसे ऐसा फाइटर बनना है जो सौ लोगों पर भी भारी पड़े और उसे कोई हरा न पाए।

मर्द को दर्द नहीं होता

इसपर दादा उसे एक कोच के रूप में सलाह देते हुए कहते हैं कि अगर मार्शल आर्ट का योद्धा बनना है तो कुछ हफ्ते इसके लिए काफी नहीं होंगे, तुम्हे कडा प्रशिक्षण लेना होगा, जमकर मेहनत करनी होगी और ध्यान रहे इस प्रशिक्षण के बारे में किसी को पता न चले, एक दिन तुम कराटे मास्टर ज़रूर बन जाओगे। बच्चे ने ऐसा ही किया और फाइटर बन गया।

ये जवानी है दीवानी (2013)

बनी एक बेफिक्र और जोश वाला लड़का, जो हमेशा अपने आप को आसमान में रखता, जीवन में हमेशा खुद को ऊपर रखने की चाहत के साथ आगे बढ़ता रहता। जी हाँ इसके पीछे की वजह उसके पिता, शायद इस डायलॉग से आप समझ जाए।

ये जवानी है दीवानी (2013)

” जहाँ तुम्हारा जी चाहे जाओ, जो जी चाहे करो, जिस तरह ज़िन्दगी जीनी है जियो, बेटा एक बात याद रखना ज़िन्दगी चाहे जो हो जाए, कुछ भी, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, हम तो अभी तक इंतज़ार में है कि हमारे पिता एक ट्रिप पर जाने की अनुमति दे दें। ये वही शब्द थे जो हर वक़्त बनी की पीठ थपथपाते रहते थे।

शेफ (2014)

जब बाप और बेटा अपनी मोबाईल रेस्टोरेंट वैन से लोगों को मुफ्त में खाना खिला रहे थे तो बेटा काफी जल्दबाज़ी में लगा और लोगों को थोड़ा कच्चा खाना परोसने के लिए ले जाने लगा। ये बात पिता ( सैफ अली खान ) को पसंद नहीं आयी, पिता ने बेटे को अलग ले जाकर धीरे से एक सलाह दी।

Chef (2014)

पिता ने कहा कि किसी को अपने हाथ से खाना खिलाने का मौक़ा मिलना, रब की बड़ी मेहर होती है क्या तुमने कभी किसी के लिए खाना बनाते हुए इसे महसूस किया है?

हुम तुम

ऋषि कपूर एक ऐसे डैड की भूमिका में हैं जो हम तुम.के क्लाइमेक्स के दौरान अपने बच्चे को कुछ बहुत अच्छी सलाह देता है। वह अपने बेटे को बताता है कि कैसे उसने अपने जीवन का प्यार खो दिया और नहीं चाहता था कि वह वही गलतियाँ करे।

हम तुम

कपूर यहां तक ​​कहते हैं कि वह पहले पिता होंगे जो नहीं चाहते कि उनका बेटा उनके जैसा बने। सैफ अली खान द्वारा अभिनीत करण जल्दी से समझ जाता है कि उसके पिता क्या कहना चाह रहे हैं और वह अपनी महिला प्रेम को पाने के लिए निकल पड़ता है।

शानदार (2015)

पंकज कपूर की बेटी (जो उनकी असल जिंदगी की बेटी भी है) शादी करने वाली है। माँ कमरे में प्रवेश करती है और कहती है कि सभी शादियाँ समझौते पर बनी हैं।

शानदार (2015)

पिता स्पष्ट रूप से देख सकता है कि वह परेशान है और उसे सलाह देती है कि उसे कोई समझौता करने की आवश्यकता नहीं है। वह इस सलाह को दिल से लेती है और दूल्हे को वेदी पर फेंक देती है। करना एक बहादुरी भरा काम था।

पीकू (2015)

अमिताभ बच्चन ने निभाया यह पिता एक नारीवादी है। वह हमेशा अपनी बेटी और हर उस व्यक्ति को उपदेश देता है जो सुनना चाहता है कि शादी खराब नहीं है, लेकिन महिलाओं का एक उद्देश्य होना चाहिए।

पीकू (2015)

उन्हें केवल अपने पतियों की सेवा करने वाले लोग नहीं होने चाहिए। और हम और अधिक सहमत नहीं हो सके। अधिक लोगों के पास उनके जैसा पिता होना चाहिए जो उन्हें जीवन भर मार्गदर्शन दे सके।

दृश्यम

2 अक्टूबर को क्या हुआ यह तो सभी जानते हैं क्योंकि इस फिल्म में पिता की भूमिका निभाने वाले अजय देवगन आपको बार-बार बताते हैं। यह सरासर झूठ हो सकता है लेकिन यह उसकी पत्नी और बेटियों को आपराधिक जांच से बचाता है।

दृश्यम

वह अपनी बेटियों को सलाह देते हैं कि क्या कहना है ताकि उनकी सभी कहानियां अच्छी तरह से गठबंधन कर सकें। पुलिस भी उन पर कुछ नहीं पकड़ पा रही है। हालांकि यह सलाह नहीं है, हमें शायद वास्तविक दुनिया में इसे ध्यान में रखना चाहिए, अपने परिवार के प्रति उनका समर्पण निश्चित रूप से उन्हें एक सुपर डैड बनाता है!

लक्ष्य (2004)

एक बहुत ही इमोशनल सीन में, करण के पिता उससे कहते हैं कि उसे उस पर बहुत गर्व है। आने में काफी समय था और दोनों बस फूट-फूट कर रोने लगे। हम भी उस दृश्य के बारे में सोचकर अपनी टपकती आँखों को पोंछ रहे हैं।

Lakshya (2004)

वह अपने बेटे को बताता है कि कैसे हर कोई बिना किसी कारण के अपने बेटों के बारे में डींग मारता है और उनमें से किसी के भी बेटे नहीं हैं जो राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। वह अपने बेटे से कहता है कि वह सार्थक काम कर रहा है। यह निश्चित रूप से उसे युद्ध जीतने के लिए प्रेरित करता है।

फना(2006)

ज़ूनी एक अंधी लड़की है जिसके माता-पिता अत्यधिक सुरक्षात्मक हैं। उसे एक ऐसे आदमी से प्यार हो जाता है जो कानून के दूसरी तरफ है। बेशक, उसे कोई जानकारी नहीं है। जब वह अपनी मां से प्यार के बारे में सलाह मांगती है, तो मां ज़ूनी को कुछ ऐसा बताती है जो उसके बाकी जीवन को आकार देने में मदद करता है।

Fanaa (2006)

वह कहती हैं, “जान उससे दो जो अपना दिल तुम्हें दे… लेकिन अपना गुरूर सिरफ हम पे कुर्बान करो… जो तुम्हारे प्यार में फना हो जाए।” माइक गिरा!

कल हो ना हो(2003)

मुख्य किरदार नैना दर्द कर रही है, और उसे पता नहीं है कि उसे पति के रूप में रोहित को क्यों चुनना चाहिए। इसके लिए, उसकी माँ उसे दिलासा देती है और बताती है कि क्यों। और ऐसा लग रहा था कि अपनी रोती हुई बेटी को सलाह देना आसान नहीं था।

कल हो ना हो(2003)

वह कहती हैं कि मजबूत दिमाग वाला पति चुनना जरूरी है। यह जानते हुए भी कि आप किसी और के प्यार में हैं, वह आपसे प्यार करता है। खैर, माँ अधिक सही नहीं हो सकती थी।

अरमान(2003)

यह फिल्म हिट एंड मिस रही थी। लेकिन, गाने यादगार रहे। फिल्म के बारे में एक और यादगार बात थी और वह है शानदार सलाह जो पिता अपने बेटे, मुख्य अभिनेता अनिल कपूर को देते हैं।

अरमान(2003)

अपनी पत्नी का ऑपरेशन करना चाहिए या नहीं, इस पर बहस करते हुए, उसके पिता एक सपने में उसके पास आते हैं और उसे शानदार सलाह देते हैं। वह उसे बताता है कि अगर वह ऑपरेशन करता है और उसकी पत्नी को कुछ होता है तो उसे क्या नुकसान होगा। लेकिन, वह उससे यह भी कहता है कि अगर उसने ऑपरेशन नहीं किया तो वह खुद को कभी माफ नहीं कर पाएगा।

883 (2021)

द कपिल देव बायोपिक पहली बार भारत द्वारा क्रिकेट विश्व कप जीतने के बारे में एक अद्भुत फिल्म है। हालांकि, एक सीन है जहां ऑन-स्क्रीन कपिल (रणवीर सिंह) अपनी मां से बात करता है।.

83 (2021)

80 के दशक में, लंबी दूरी की कॉल बहुत मुश्किल थी। लेकिन, उनकी मां की एक पंक्ति जो उन्हें बताती है, वह उनके साथ गूंजती है। वह कहती है, “बेटा, जीत के आना।” और इसलिए वह करता है, हर उस विषमता के खिलाफ जिसका वह सामना करता है।

शुभ मंगल ज्यादा सावधान (2020)

अपने माता-पिता के पास आना कोई आसान काम नहीं है। यह तब कठिन होता है जब आपके माता-पिता विचार के पुराने स्कूल से संबंधित हों। इस फिल्म में भी, पिता अपने बेटे की पसंद को स्वीकार करने के लिए समय निकालता है।

शुभ मंगल ज्यादा सावधान (2020)

हालाँकि, वह उसे कुछ दिल को छू लेने वाली सलाह के साथ छोड़ देता है। वह कहते हैं, “हमें नहीं पता बेटा हम ये सब समझ पाएंगे नहीं, लेकिन हमारे समझ की वजह से, तुम्हें आधी अधूरी जिंदगी जीने की कोई जरूरत नहीं है।” हम आपके बारे में नहीं जानते लेकिन हम निश्चित रूप से पिघल रहे हैं।

कभी खुशी कभी ग़म (2001)

यह फिल्म पूरे परिवार के बारे में थी। जीवन में कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए शाहरुख खान कुछ सलाह देते हैं। यह सलाह बाद में उनके ऑन-स्क्रीन भाई, ऋतिक रोशन के माध्यम से उनके बेटे तक पहुँचती है।

कभी खुशी कभी ग़म (2001)

यह इस प्रकार है, “जिंदगी में अगर कुछ बनना हो, कुछ हासिल करना हो, कुछ जीता हो … तो हमेश दिल की सुनो … और अगर दिल भी कोई जवाब ना दे तो आंखें बंद करके अपनी मां और पापा का नाम लो … देखना हर मंजिल पार कर जाओगे, हर मुश्किल आसान हो जाएगा… जीत तुम्हारी होगी, सिर्फ तुम्हारी।”

धूम 3 (2013)

जब कभी आपको महसूस होने लगे कि आप अपना आत्मविश्वास खो रहे हैं, तो आप जैकी श्रॉफ द्वारा अपने बेटे को दी गई यह सलाह आपके काम आ सकती है, फिल्म के एक दृश्य में वह अपने बेटे को प्रेरित करते हुए कहते हैं “जो दुनिया को नामुमकिन लगे; वही मौका होता है; करताब दिखने का।

धूम 3 (2013)

मुश्किल समय से गुज़र रहे एक बच्चे को यह बताना वास्तव में प्रभावित करने वाली बात है, यह आपको भरोसा देती है कि आप कुछ भी करने में सक्षम हैं।

दिल चाहता है (2001)

कुछ पिता सिर्फ सही बात कहना जानते हैं। जब आकाश अपने जीवन के प्यार को छोड़ने वाला होता है, तो उसे यह बताए बिना कि वह उसके बारे में कैसा महसूस करता है, उसके पिता उसे कुछ शानदार सलाह देते हैं।

दिल चाहता है (2001)

वह अपने बेटे को सलाह देते हुए इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वह शालिनी को बताए कि वह उसके बारे में क्या सोचता है। वह आकाश से यह भी पता लगाने के लिए कहते है कि वह दूसरे मर्द से शादी करने का विकल्प क्यों चुन रही है। पिता की सलाह पर अमल करते हुए आखिरकार आकाश ने शालिनी के लिए अपने प्यार का इजहार किया।

कभी अलविदा ना कहना (2006)

अमिताभ बच्चन ने एक ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया जिसने अपना जीवन पूरी ज़िंदादिली और सिद्धांतों के साथ जिया। जब वह अपनी अंतिम साँसे ले रहे थे तो उस वक़्त अपनी बहू को बेहतरीन सलाह देते हैं वह अपनी बहू को प्यार करते थे और जानते थे कि वह उनके बेटे के साथ खुश नहीं है, लिहाजा वह बहु से अपने बेटे को छोड़ने के लिए कहता है।

कभी अलविदा ना कहना (2006)

यह सुनकर वह चौंक जाती है लेकिन अमिताभ बच्चन अपनी सलाह को सही ठहराते हुए कहते हैं कि उसके साथ रहकर वह उसे और खुद को सच्चे प्यार से दूर रख रही है, यह अधूरा रिश्ता किसी के लिए खुशी नहीं लाएगा।

दोस्ताना (2008)

जब नेहा को उम्मीद के मुताबिक प्रमोशन नहीं मिलता तोह वह रोने लगती है। वह महसूस करती है कि ये उसका हक़ था जो उसे नहीं मिला, तो समीर की मां उसे हौसला बंधाते हुए सलाह देती है। वह अपनी भावनाओं भावनाओं का सामना करे।

दोस्ताना (2008)

वह कहती है कि उसके रास्ते में कुछ बड़ा आ रहा है इसलिए बस सब्र रखे। और चमत्कारिक रूप से, ऐसा ही होता है। ये एक ऐसी सलाह थी जो उस वक़्त महारे काम आती है जब हमें लगता है कि हमारे जीवन में कुछ अनुचित हुआ है।

बाग़बान (2003)

अपने बच्चों से निराश होकर राज मल्होत्रा ​​एक आत्मकथा लिखते हैं। पुस्तक की सफलता के बाद आयोजित किये गए एक कार्यक्रम में वह देखता है कि उनके बच्चे भी दर्शकों के बीच बैठे है।

बाग़बान (2003)

बच्चों को नसीहत देते हुए वह कहते है, “एक बाप अगर अपने बेटे की जिंदगी का पहला कदम उठाने में उसकी मदद कर सकता है … तो वही बेटा अपने बाप के आखिरी कदम उठाने में उससे सहारा क्यों नहीं दे सकता?” यह सोचने वाली बात है, निश्चित रूप से।

बाजीराव मस्तानी (2015)

किसी व्यक्ति के जीवन में अनुभव के महत्व को अक्सर कम करके आंका जाता है। फिल्म में आदित्य पंचोली ने बाजीराव के जनरल की भूमिका निभाई है और जो कि किसी पिता जैसी शख्सियत से कम नहीं दिखाई देती हैं।

बाजीराव मस्तानी (2015)

वह अपने अनुभवों को लेकर गहरी बात करते हुए कहते हैं, “पुत्र अगर पिता की पगड़ी पहन ले तो उसमें पिता की बुद्धि तो नहीं आ जाती , … चंदन के पेड़ को भी सुगंध देने के लिए एक उमर की आवश्यकता होती है।”

फन्ने खां (2018)

जब आपके पिता आपके सबसे बड़े चीयरलीडर हों तो आपको अपना सर्वश्रेष्ठ बनने से कोई नहीं रोक सकता। इस फिल्म की तरह, जब लता अपने पिता को बताती है कि वह दर्शकों बड़े हुजूम के सामने गाने से कितनी डरती है, तो वह उसे सबसे शानदार सलाह देता है।

फन्ने खां (2018)

वह कहते हैं, “उठकर बहार फेक दे उस डर को, तू सबसे अच्छी है। तुझे कोई रोक नहीं सकता। खुल कर गा, दिल से गा। दिखा दे पूरी दुनिया को कि तू कौन है। लता, मेरी बेटी।”

थप्पड़ (2020)

अमू अपने पति से अलग होने का बड़ा फैसला लेती है क्योंकि वह लोगों की पूरी भीड़ के सामने उसे थप्पड़ मारता है। जब वह अपने पिता से पूछती है कि क्या वह सही काम कर रही है, तो वह उसे अच्छे तरीके से सलाह देता है।

थप्पड़ (2020)

उनका कहना है कि हम वही करते हैं जो हमें सही लगता है। जब तक हम चीजों को ध्यान से नहीं सोचते और कोई ठोस कदम नहीं उठाते तब तक पशोपेश में रहते है, ज़रूरी नहीं कि सही काम करने से हमेशा खुशी ही मिले।

वीर ज़ारा (2004)

ज़ारा अपनी दादी की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए भारत आती है और वीर से मिलती है। वीर उसके प्यार में पड़ जाता है पिता को इसकी भनक लग जाती है। एक सुबह, वह अपने बेटे वीर को कुछ ऐसी बातें कहते हैं, जो फिल्म की जड़ बन जाती है।

वीर ज़ारा (2004)

वह उसे बताते है कि जब सही महिला उसके जीवन में प्रवेश करती है, तभी एक पुरुष अपना जीवन पूरी तरह से जी सकता है। अपने पिता पर भरोसा रखो और ज़ारा को अपने दिल की बात बता दो, वरना बहुत देर हो जाएगी।

ताल (1999)

मानसी के पिता के द्वारा दी गयी महत्वपूर्ण सलाह उसे अंत में सही निर्णय करने में मदद करती है, मानसी के पिता कहते हैं, “दुनिया में पहले दोस्त बनते हैं, फिर प्यार होता है फिर झगड़ा होता है। झगड़ा होकर अगर दोस्त आपके सामने आ कर माफ़ी मांगे तो इस से प्यार और बढ़ जाता है।”

ताल (1999)

आखिरकार, मानव और मानसी के बीच ऐसा ही हुआ, पिता की उस एक सलाह ने वास्तव में मानसी को सही चुनाव करने के लिए प्रेरित किया।

दो दूनी चार (2010)

“हम दोनों जीवन में असफल हो जाते हैं यदि मैं आपको वह नंबर दे दूँ, जिसके आप हक़दार नहीं हो, आप असफल होंगे क्योंकि ऐसा करने से आप सीख जाओगे कि सब कुछ खरीदा जा सकता है। मैं असफल हो जाऊंगा क्योंकि तुम मुझे मेरी बेईमानी के लिए याद करोगे। मैं चाहता हूं कि मेरे छात्र मुझे तब याद रखें जब मेरे पढ़ाये पाठ से उनके जीवन को लाभ मिले।”

Do Dooni Chaar (2010)

ऐसा ऋषि कपूर का ये किरदार न सिर्फ अपने छात्रों को ये बात बताता है बल्कि उसकी बेटी भी ताउम्र इस बात को याद रखेगी कि उसके पिता ने जीवन के लिए क्या कहा था।

द स्काई इज़ पिंक (2019)

प्रियंका चोपड़ा का किरदार उन्हें स्क्रीन पर सांत्वना देने की कोशिश कर रहा है क्योंकि उनके शिक्षक ने उन्हें आसमान को गुलाबी रंग देने के लिए डांटा था। वह उसे कुछ सलाह देती है कि जिससे कि वह जीवन में बाद में इस गहरे अर्थ को समझेगा।

द स्काई इज़ पिंक (2019)

वह कहती हैं, “कोई जरूरी नहीं है किसी और के कहने पर आसमान का रंग बदलने की। कभी भी नहीं। हर एक का अपना आसमान होता है। मुझे मेरे आसमान का रंग जैसा लगा, मैंने वैसा किया। अगर आपको लगता है कि आपके आसमान का रंग पिंक है, तो स्काई पिंक है। बस।”

शकुंतला देवी (2020)

जब शकुंतला की बेटी अपने बच्चे को खाना खिलाने में परेशानी महसूस करती है , तो वह रोने लगती है और कहती है कि वह एक बुरी माँ है। इस मौके पर उसकी सास उसके बचाव में आती है और उसे शानदार सलाह देती है।

शकुंतला देवी (2020)

वह उससे कहती है, “हर मां बुरी मां होती है। माँ ज़्यादा प्यार करले तो बच्चे बिगड़ जाते हैं… बच्चों को थोड़ा कम प्यार करदे तो भी बच्चे बिगड़ जाते हैं… कोई माँ परफेक्ट माँ होती ही नहीं है।”

कोई… मिल गया (2003)

जब रोहित निशा के साथ मज़ाक करता है, तो उसकी माँ उसे उससे माफ़ी मांगने की अच्छी सलाह देती है। वह उससे कहती है, “वादा करो की तुम जब भी उस लड़की से मिलोगे, तुम उससे माफ़ी मांगोगे और उसे सॉरी बोलोगे।”

कोई… मिल गया (2003)

एक आज्ञाकारी बेटे की तरह रोहित ये सलाह मानता है और माँ को धन्यवाद देता है,जिसके बाद वह निशा में एक नया दोस्त देखता है। दोनों की ये दोस्ती बाद में प्यार में बदल जाती है। मानो माँ की एक सलाह ने रोहित के लिए चीजें ठीक कर दी।

मिशन कश्मीर (2000)

फिल्म में सोनाली कुलकर्णी ने ऋतिक रोशन की दत्तक मां की भूमिका निभाई है। और जब वह अपने ही पति (संजय दत्त द्वारा अभिनीत) के खिलाफ कानून के गलत पक्ष में हो जाता है, तो वह उसे ज़रूरी सलाह देते हुए कहती है वह एक गंभीर गलती न करे।

मिशन कश्मीर (2000)

वह कहती है कि अच्छाई और बुराई के बीच की लड़ाई में उसे ही तय करना होगा कि इस लड़ाई में क्या बचेगा। अल्ताफ इस सलाह को उस वक़्त याद करता है जब वह दत्त के साथ लड़ाई में होता है और अंत में सही निर्णय लेता है।

वी आर फैमिली (2010)

काजोल एक जानलेवा बिमारी से जूझते हुए दुनिया से दूर जा रही है। बच्चों को इस बात की चिंता सताये जा रही है, छोटे बच्चे शायद इस बात का सामना कर पाएंगे या नहीं पर उनमें सबसे बड़ी बेटी इस बात से बुरी तरह आहत हुई है।

वी आर फैमिली (2010)

अपनी बेटी को हिम्मत देते हुए अपनी आखिरी सलाह के तौर पर , वह कहती है, “रिश्तों को हमेशा बांधके नहीं रख सकते हैं, बेटा। कभी साथ देते हैं तो कभी नहीं। बस उन्हे पाने का एक ही तरीका होता है – प्यार।”

गोलमाल 3 (2010)

फिल्म के सीन में जेट-स्की हैंडल पर गोंद लगाने के बाद गोपाल और लक्ष्मण के बीच झगड़ा होता है, इस कारण वह अपने प्रतिद्वंद्वियों के व्यवसाय को तो नष्ट कर दते हैं लेकिन उनका खुद का भी बड़ा नुकसान हो जाता है देता है, इस बात का पता माँ को चलता है और वो घटनास्थल पर पहुँच कर काफी दुखी हो जाती है वह अपने बच्चों को समझाते हुए उन्हें वह बात याद दिलाती हैं जो उन्होंने हमेशा उन्हें बताया है।

गोलमाल 3 (2010)

वह कहती हैं, “आग अगर लगाओगे, तो हाथ तुम्हारा भी जलेगा।” और यह सच है। काश उन दोनों ने पहले ही अपनी माँ की सलाह पर ध्यान दिया होता।

रेडी (2011)

फिल्म के अंतिम क्षणों में अंत में, दो चौधरी गुंडों के पिता अपने बेटों को सलाह देकर उन्हें एहसास दिलाते है जिससे उन्हें जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने में मदद मिलती है। वह एक बेहतर इंसान के तौर पर सलमान खान के किरदार के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि यह आदमी अपनी दुल्हन के लिए इतना बलिदान कर रहा है

रेडी (2011)

और एक तुम लोग अपनी पत्नियों को अपनी पुरानी सोच के कारण हर दिन बलिदान करते हुए देखते रहते हो । खैर, कहानी जल्दी बदल जाती है और इसका सुखद अंत होता है।

विवाह (2006)

शादी आसान नहीं है। निश्चित रूप से, आप सभी इस बात से इत्तिफ़ाक़ रखते होंगे। फिल्म का मुख्य किरदार प्रेम भी विवाह के लिए तैयार नहीं था। सौभाग्य से, उसके पिता उसे कुछ अच्छी सलाह देते हैं जो हमें लगता है कि हर माता-पिता को अपने बच्चे को बताना चाहिए।

विवाह (2006)

वह कहते हैं, “तुम्हारी मां कहा करती थी कि शादी के रिश्ते में सबसे ज्यादा जरूरी है एक दसरे के प्रति विश्वास और ईमानदारी।” और इसके आगे कोई सच्चाई नहीं है।

वक्त: द रेस अगेंस्ट टाइम(2005)

आदित्य ठाकुर एक रईस परिवार में पैदा हुआ, माता पिता के प्यार के साथ साथ उसके पास सब सुख सुविधाएं थी। लेकिन, आदित्य लापरवाह दिखा और उसने किसी को भी महत्व देना या जिम्मेदारी की भावना को महसूस नहीं किया। ऐसे में उसके पिता क्या करते?

वक्त: द रेस अगेंस्ट टाइम(2005)

इस वक़्त ईश्वरचंद्र ने आदित्य को घर छोड़ने के लिए कहा और उस वक़त तक वापस नहीं आने की बात कही जबतक कि वह खुद कुछ बन नहीं जाता। ये वह सलाह थी जिसने बेटे आदित्य का जीवन के प्रति दृष्टिकोण ही बदल दिया। कभी-कभी, कठिन फैसले सर्वोत्तम प्रेम की अनुभूति कराते है।

नमस्ते लंदन (2007)

अर्जुन की पत्नी जसमीत लंदन में किसी और से शादी कर रही है क्योंकि देश का कानून उनकी शादी को स्वीकार नहीं करता है। इससे जसमीत के पिता की चिंता बढ़ जाती है । वह इस बारे में अर्जुन को बताता है और उसका दिल जीतने के लिए कुछ करने की सलाह देता है।

नमस्ते लंदन (2007)

सबसे पहले, वह अपने ससुर के अनुरोध को गंभीरता से नहीं लेता लेकिन बाद में वो एक नए जोश के साथ कोशिश करता है और अंत में जसमीत चार्ली को छोड़कर अर्जुन के साथ भाग जाती है।

ख़ूबसूरत

माँ बेटी के रिश्ते में कितनी गहरी दोस्ती हो सकती है, इसका उदाहरण फिल्म में दर्शाया गया है। इस मां-बेटी की जोड़ी का रिश्ता दो सबसे अच्छे दोस्तों से अलग नहीं है। माँ इतनी मिलनसार है कि जब भी बेटी कोई गड़बड़ करती है, तो वह हमेशा सलाह के लिए तैयार रहती है।

ख़ूबसूरत[

मिली राजकुमार को चूम लेती है , राजकुमार की पहले ही सगाई हो चुकी है। अब मिली खुद को अलग और असहाय महसूस करती है, ऐसे में उसकी माँ पहले उसे गहरी साँस लेकर शांत होने के लिए कहती है। इसके बाद, वह अपनी बेटी को राजकुमार के साथ सीधी बात करने और उसके साथ चीजें खत्म करने के लिए कहती है। यह अच्छी शानदार सलाह थी लेकिन टी के लिए नटखट बेटी ने इसे मानना ठीक नहीं समझा।

जाने तू… या जाने ना (2008)

हिंसा के बीच किसी का भला नहीं हो सकता, जय के पिता एक हिंसक परिवार से ताल्लुक रखते थे और अंततः उनकी जान चली गई। अब जय की माँ अपने बेटे को इस माहौल से दूर रखना चाहती है।

जाने तू… या जाने ना (2008)

वह चाहती है कि लड़ाई झगडे का साया जय पर न पड़े और न ही वह अपने पिता की तरह सोच रखे। अकेले दम पर बच्चे को पालने वाली माँ उसे, हर वक़्त अहिंसा और प्यार के रास्ते पर चलने की सीख देती है। यह बेहतरीन सलाह है जो हर माता-पिता अपने बच्चों को सिखा सकते हैं।

वेक अप सिड (2009)

जब आप थोड़े बिगड़ैल होते हैं, तो प्यार का कठोर रूप आपके लिए मददगार साबित होता है। और ये प्यार सिर्फ माता पिता ही आपको दे सकते हैं। सिड के साथ भी ऐसी ही हुआ जब उसके पिता ने सिड को ज़िन्दगी का अलग रूप दिखाते हुए एक नयी दिशा की तरफ मोड़ा। ज़िम्मेदारी और अपने कर्तव्यों की अहमियत बताने के लिए उसके पिता ने आर्थिक रूप से मदद करना रोक दिया, जिसके बाद सिड ने मुश्किल घडी में आगे बढ़ना सीखा और एक कामयाब इंसान बना ।

वेक अप सिड (2009)

पहली तनख्वाह मिलते ही वह सीधे अपने पिता के कार्यालय जाता है और उनके हाथ में अपनी तनख्वाह थमा देता है, किसी पिता के लिए यह बड़े गर्व की बात है। वह अपने बेटे को हमेशा कड़ी मेहनत और पूरे दिल से काम करने की सलाह देता है।